ICSE Class 9 Hindi Sample Question Paper 2 with Answers

Section-A [40 Marks]

Question 1.
Write a short composition in Hindi of approximately 250 words on any one of the following topics :
निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर हिन्दी में लगभग 250 शब्दों में संक्षिप्त लेख लिखिए :
(i) ‘सदाचार के समक्ष धन-सम्पत्ति एवं ऐश्वर्य सब तुच्छ हैं।’ इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
(ii) त्योहारों का व्यापारीकरण उनके वास्तविक महत्त्व को समाप्त कर देता है। स्पष्ट कीजिए।
(iii) परिवार बालक की प्रथम पाठशाला स्पष्ट कीजिए।
(iv) ‘बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख’—इस उक्ति पर आधारित एक मौलिक कहानी लिखिए।
(v) नीचे दिये गये चित्र को ध्यान से देखिए और चित्र के आधार बनाकर उसका परिचय देते हुए कोई लेख, घटना अथवा कहानी लिखिए, जिसका सीधा व स्पष्ट सम्बन्ध चित्र से होना चाहिए।
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Answer:
(i) सदाचार सच्चरित्रता या सदाचार ही वस्तुतः

जीवन का सार है। संसार की बड़ी से बड़ी सम्पत्ति, महान् साम्राज्य, कोई भी लौकिक वस्तु चाहे वह कितनी ही मूल्यवान हो, चरित्र के सामने उसका कोई भी मूल्य नहीं। धन से श्रेष्ठ स्वास्थ्य है, स्वास्थ्य से भी श्रेष्ठ चरित्र है। अंग्रेजी में एक कहावत है-“धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और यदि चरित्र गया तो सब कुछ ही नष्ट हो गया।” सच्चरित्रता के सामने धन और स्वास्थ्य का कोई भी मूल्य नहीं है। चरित्रवान व्यक्ति हर स्थान पर समादरित होता है।

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सदाचार अनेक गुणों का मिला-जुला रूप है। सत्य आचरण, श्रेष्ठ व्यवहार, अच्छा चाल-चलन, इन्द्रिय संयम, उदारता, पवित्रता, नम्रता, प्रेम और ईमानदारी इसके अन्तर्गत आते हैं, जिसका अर्थ है-श्रेष्ठ आचरण। मन, वचन और कर्म से सदाचार का पालन करने वाला व्यक्ति महात्मा होता है और हर स्थान पर पूज्य होता है। विद्वान् की विद्वत्ता, शक्तिशाली की शक्ति, धनी का धन चरित्र से ही शोभित होते हैं। बिना सच्चरित्रता के बल, विद्या और धन का कोई मूल्य नहीं। दुराचारी ब्राह्मण से सदाचारी शूद्र अच्छा होता है। सदाचारी व्यक्ति को इसके लिए कड़ी साधना करनी पड़ती है। विनय ही मनुष्यों का आभूषण है। विनयशील मनुष्य सभी का प्रिय होता है और विनय सदाचार से ही उत्पन्न होती है।

सदाचार से विनय के अलावा अन्य गुण जैसे—धैर्य, शिष्टाचार, संयम, आत्मविश्वास तथा निर्भीकता का विकास होता है। हमारे देश की प्रतिष्ठा सदाचार के कारण ही है। भारत में अनेक सदाचारी पुरुषों ने जन्म लिया है जैसे—पुरुषोत्तम राम, आद्य शंकराचार्य, महाराणा प्रताप, शिवाजी, स्वामी विवेकानन्द आदि। इन विभूतियों ने अपने चरित्र से इतिहास के पृष्ठों को उज्ज्वल किया है। इसी प्रकार चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानन्द अपनी सच्चरित्रता के बल पर ही समाज का उद्धार कर सके। जो भी पुरुष महान् हुए हैं वे संयम और सदाचार से ही उन्नति को प्राप्त हुए हैं। सदाचार ही महिमा शास्त्रों में भी वर्णित है जैसे—

आचाराल्लभते ह्यायु राचाराल्लभते श्रियम्।
आचाराल्लभते कीर्तिम् आचारः परमं धनम्॥

अर्थात् सदाचार से आयु बढ़ती है, सदाचार से लक्ष्मी बढ़ती है, सदाचार से कीर्ति बढ़ती है और सदाचार ही सबसे बड़ा धन है। इसलिए सदाचार की सदा रक्षा करनी चाहिए। सदाचार के बिना मनुष्य के पास कुछ नहीं बचता। सदाचार से ही सम्मान प्राप्त होता है। सदाचारी संन्यासी सदाचारी मनुष्य और सदाचारी विद्यार्थी हर स्थान पर आदरणीय होता है। सदाचार से ही अधार्मिकता मिटती है। देश में जो आज संकट की स्थिति बनी हुई है वह सदाचार के अभाव में ही है। लोग सदाचार का पाठ भूल गए हैं।

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भारतवासी दिव्य आर्यों की सन्तान हैं। उनका लक्ष्य देश, धर्म और समाज को उन्नत करना था। बड़े-बड़े ऋषियों ने समाज को सद्गुणों से अवगत कराया और मनुष्यों के चरित्र को ऊपर उठाया। आज सभी की यह अभिलाषा है कि हमारा देश उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहे। यह तभी सम्भव है जब सभी भारतवासी सच्चरित्र बनें, सहृदयता लाएँ, समानभाव से एक दूसरे से मिलें और धार्मिक सद्भाव रखें। हम ऐसे कार्य करें कि देश को हम पर गर्व हो।

अतः यह कहना उचित है कि सदाचार के समक्ष धन-सम्पत्ति एवं ऐश्वर्य सब तुच्छ हैं।

(ii) त्योहारों का व्यापारीकरण उनके वास्तविक महत्त्व को समाप्त कर देता है।

त्योहार वह अवसर है जब हम उसे मनाकर हार्दिक प्रसन्नता का प्रदर्शन करते हैं। सभी लोग एक-दूसरे से मिलकर उल्लसित होते हैं। त्योहार नीरस जीवन को भी सरस बनाते हैं और समाज में शान्ति और खुशी लाते हैं। समाज में मेल-जोल और प्रेम बढ़ता है। सभी धर्मों के लोग अपने-अपने रंगीन त्योहार बड़ी खुशी से मनाते हैं। भारत विभिन्न धर्मों, विभिन्न भाषाओं और मिली-जुली संस्कृति का देश है इसलिए भारतीय पूरे वर्ष में अनेक त्योहार मिल-जुलकर कर मनाते हैं, लेकिन आजकल देखा जाता है कि त्योहारों के व्यापारीकरण ने उनके वास्तविक महत्त्व को कम कर दिया है।

अब उन्हें किसी व्यापार के उच्चीकरण का साधन बना लिया गया है। भारतीय त्योहार अपने-अपने मतों के अनुसार भिन्नता रखते हैं। सभी धर्म के लोग अपना-अपना त्योहार मनाते हैं, लेकिन उनका आधुनिक रूप पहले के रूप से भिन्नता रखता है।

राष्ट्रीय त्योहार जैसे स्वतन्त्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस और गांधी जयन्ती देश-भक्ति की भावना से मनाए जाने चाहिए। इन त्योहारों पर पूरे राष्ट्र में छुट्टी घोषित रहती है और सभी प्रदेशों की राजधानियों में बड़ी धूम-धाम और सज-धज के साथ मनाए जाते हैं, लेकिन कभीकभी देखने में आता है कि इन त्योहारों के संयोजक अपने निहित स्वार्थों के कारण आपस में लड़ने लगते हैं।

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भारत की राजधानी दिल्ली में सभी राष्ट्रीय त्योहार मुख्य रूप से बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। गणतन्त्र दिवस पर जो सेना के तीनों अंगों की परेड, प्रदेशों की झाँकियाँ और नई-नई मशीनों का प्रदर्शन हमें भारत के प्रति गौरवान्वित करता है, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि पारितोषिक उसी को मिलते हैं जिसकी सरकार में पहुँच है। व्यापारिक कम्पनियाँ अपने माल का प्रदर्शन करती हैं।

विज्ञापन का बोलबाला शत-प्रतिशत बना रहता है। योग्यता के आधार पर पारितोषिक या पदक दिये जाने चाहिए। अतः हम अनुभव करते हैं कि राष्ट्रीय त्योहारों में भी व्यापारीकरण हावी होता जा रहा है। अब आते हैं धार्मिक त्योहार । इन त्योहारों का धार्मिक महत्त्व समाप्त होकर व्यापारीकरण के अन्दर ‘पियो, प्रसन्न रहो और जिओ’ का सिद्धान्त अपना लिया है। दीपावली का त्योहार पूरे देश में मनाया जाता है।

रात को लक्ष्मी की पूजा की जाती है। बाजार और घर रोशनी से सजाया जाता है। धार्मिक महत्त्व को भूलकर लोग पटाखों, शराब और जुआ खेलने में मस्त रहते हैं। पूरे भारत में अरबों के पटाखे जला दिये जाते हैं जो वातावरण को प्रदूषित करते हैं। त्योहारों पर व्यापारियों की खूब चाँदी होती है। सभी लोग त्योहारों पर अधिक खर्च करते हैं, नये कपड़े बनवाते हैं, घरों को रोशनी से सजाते हैं आदि आदि।

अधिक रोशनी करने से बिजली की खपत अधिक होती है। संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। इससे लोग देर रात तक जागते हैं। पटाखों के चलने से ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण बढ़ता है, लेकिन पटाखों के व्यापारियों को आर्थिक लाभ होता है। दीपावली पर अधिक खर्च करने के बजाय गरीबों की मदद करनी चाहिए।

इसी प्रकार होली भी रंगों का त्योहार हो गया है। रंगों की बिक्री होली के अवसर पर अधिक होती है। इस त्योहार में भी शराब पीकर दंगा करने की बुराई घुस गई है। ईद पर भी कम खुशी नहीं होती। यह त्योहार मुसलमान भाई बड़ी खुशी से और धूम-धाम से मनाते हैं। नये कपड़े बनते हैं, मीठी सिवइयाँ बनती हैं। यानी इस त्योहार पर भी खर्चा बहुत होता है। ऐसा लगता है कि सभी त्योहारों का व्यापारीकरण कर दिया गया।

त्योहारों पर दिखावा अधिक होने के कारण वे लोग भी अधिक खर्च करते हैं जो खर्च करने लायक नहीं हैं। इससे कर्जदार हो जाते हैं और उन्हें अपने खर्चे के बजट में कमी करनी पड़ती है। राखी के त्योहार पर भी बहनें भाइयों के राखी बाँधती हैं। एक साधारण राखी इस त्योहार का प्रतीक थी, लेकिन आजकल बहुत महँगी-महँगी राखियाँ बाजार में महीनों पहले से ही सजाकर रख दी जाती हैं। दिखावे के लिहाज से महँगी राखी खरीदी जाती है।

जैसा कि हम जानते हैं कि त्योहार भारतीय संस्कृति से अटूट सम्बन्ध रखते हैं। ये हमारी दैनिक जिन्दगी में थोड़ा-सा बदलाव लाते हैं। इन त्योहारों के कारण ही हम एक-दूसरे से प्रेम से मिलते हैं। इनसे धार्मिक सद्भाव बढ़ता है और राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है। इन त्योहारों के धार्मिक महत्त्व को समझकर हम अपने जीवन में पवित्रता लाएँ, आपसी प्रेम-भाव बढ़ाएँ और दिखावे या व्यापारीकरण की ओर न बढ़ें।

इन त्योहारों से भाईचारा बढ़े और हम ऐसा प्रयास करें कि धार्मिक-सद्भाव बढ़ता चला जाय। हमें चाहिए कि हम लोगों को त्योहारों का वास्तविक महत्त्व समझाएँ। एक-दूसरे में प्रेम बढ़े और पारस्परिक मन-मुटाव कम हो। यह तभी होगा जब हम त्योहारों के वास्तविक महत्त्व को समझेंगे।

(iii) परिवार बालक की प्रथम पाठशाला

इस सम्पूर्ण विश्व में जितनी भी सजीव वस्तुएँ हैं, उन सबका कभी न कभी जन्म हुआ होगा। मनुष्य भगवान के घर से सभी कार्यों में पारंगत होकर नहीं आता, बल्कि वह एक ऐसे अबोध बालक के रूप में जन्म लेता है, जो दुनिया की जद्दोजहद से दूर अपने भोलेपन के विशाल सागर में डूबा रहता है। उसे दुनिया से कोई मतलब नहीं होता, परन्तु दुनिया को उससे मतलब होता है। एक नन्हा-सा बालक हमारे इस समाज की कुरीतियों से परे होता है, परन्तु, जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, उसे उसके माता-पिता समाज के अनुरूप ढालने के लिए शिक्षा देते हैं।
एक परिवार में जब किसी शिशु का जन्म होता है, तो हर्षोल्लास का वातावरण बन जाता है।

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यह अपार हर्ष अनेक कारणों से होता है। जैसे कि लोगों को लगता है कि उनके बीच एक नया साथी आया है, उनके परिवार में एक नया सदस्य आया है। विवाह उपरान्त एक स्त्री का स्वप्न या दूसरे शब्दों में उसकी कामना केवल माँ बनने की होती है और माँ बनने के साथ-साथ वह एक सम्पूर्ण नारी बन जाती है। अपने बच्चे को देखकर उसकी ममता बढ़-चढ़कर सामने आती है। उसमें मातृत्व का एक अनोखा संचार हो जाता है। एक निर्दयी से निर्दयी औरत भी माँ बनने के बाद एक दयालु और भावुक स्त्री के रूप में परिवर्तित हो जाती है।

माँ बनने के बाद वह अपना सारा ध्यान व समय अपने अबोध शिशु पर लगा देती है। उसकी हर संकट से रक्षा करती है और उस दिन का बेसब्री से इन्तजार करने लगती है जिस दिन वह नन्हा प्राणी उसे माँ कहे। धीरे-धीरे यह दिन भी आ जाता है कि बच्चा यह सम्बोधन करता है। अब उसके परिवारीजन उसे आगे बोलना सिखाते हैं। यहीं से उसका शैक्षिक जीवन आरम्भ होता है। उसे अपने सभी रिश्तेदारों का सम्बोधन कराया जाता है।

ढाई-तीन साल का होते-होते वह अबोध बालक सबको पहचानने लगता है और उसकी किलकारियों से घर आँगन झूम उठता है। धीरे-धीरे बच्चा शरारती होने लगता है। शुरू में तो छोटी-मोटी शरारतें सबको अच्छी लगती हैं, लेकिन जब उसकी शरारतें बढ़ती जाती हैं, तब उसके माता-पिता उसके गुरु बनकर उसे समझाने लगते हैं। उसमें नवीन आदर्शों का समावेश कराते हैं और समाज में उठना-बैठना सिखाते हैं, उसे अच्छे और बुरे का अन्तर समझाया जाता है।

उसे गलत काम करने पर रोका जाता है, परन्तु सही काम करने को प्रोत्साहित किया जाता है। अगर बच्चा यह सब बातें गृहण कर लेता है तो हम कहते हैं कि माता-पिता ने अपने बच्चों की मजबूत नींव डाली बच्चे तो गीली मिट्टी की तरह होते हैं और उनके माता-पिता कुम्हार। जैसे कुम्हार मिट्टी को ढालेगा वैसा ही बर्तन बनेगा। अगर कुम्हार बर्तन को ठीक से नहीं बनाएगा तो बर्तन खराब हो जाएगा।

ठीक इसी प्रकार से अनेक माता-पिता अपने बच्चे का सही तरीके से पालन-पोषण नहीं करते, उनका ध्यान नहीं रखते जिससे वह बिगड़ जाता है। बहुत से परिवारों में यह भी पाया जाता है कि बच्चे को अपने माता-पिता द्वारा डाँटा जाना दादा-दादी को अच्छा नहीं लगता है और वह अपने लाड़-प्यार से उसे बिगाड़ देते हैं। यद्यपि प्यार और स्नेह के जल से ही बालक रूपी पौधे को सींचना चाहिए, लेकिन हर चीज की अति बुरी होती है।

चार वर्ष की आयु का होते-होते बालक को हिन्दी व अंग्रेजी के वर्ण सिखाये जाते हैं। उसको गिनतियाँ भी सिखाई जाती हैं, परन्तु यह सब तो माता-पिता तभी सिखा सकते हैं, जब वह स्वयं शिक्षित हों। बच्चों में अच्छे संस्कार डालने के लिए परिवारीजनों का स्वयं सांस्कारिक होना अनिवार्य है, परन्तु चूँकि हमारे देश में अत्यधिक गरीबी और निरक्षरता है इसलिए चाहते हुए भी वह अपने बच्चों को कुछ अच्छा नहीं सिखा पाते हैं, क्योंकि उनका पूरा समय अपनी आजीविका कमाने में निकल जाता है। वह हमारे देश के भावी कर्णधारों का गुरु बनने के सौभाग्य से वंचित रह जाते हैं और न ही बालक की प्रथम पाठशाला उसका परिवार बनता है।

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निरक्षर लोग बच्चों को पाठशाला भेजने का सपना तो देखते हैं, परन्तु यह नहीं समझ पाते कि पाठशाला भेजने से पहले भी बालक को कुछ पढ़ाया जाता है, उसे कुछ सिखाया जाता है। बच्चों को सिखाने की सम्पूर्ण जिम्मेदारी गुरुजनों की नहीं होती, वह तो सिर्फ किताबी ज्ञान देते हैं, परन्तु अच्छे संस्कारों का श्रेष्ठ ज्ञान देने वाले उसके माता-पिता ही होते हैं, उसके परिवारीजन ही होते हैं, जो पाठशाला जाने से पहले ही उसमें अधिकांश गुणों का समावेश कर देते हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परिवार ही बालक की प्रथम पाठशाला होती है।

(iv) बिन माँगे मोती मिले माँग मिले न भीख।

यह कहावत सत्य है कि “बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख”। माँगने से सम्मान और प्रेम समाप्त हो जाता है। निम्नलिखित दोहे में बखूबी इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया है:

“आव गई आदर गया नैननि गया सनेह।
ये तीनों तब ही गए जबहिं कहा कछु देइ॥”

अत: माँगने से तो जहाँ तक हो बचना ही चाहिए और अपने पुरुषार्थ पर भरोसा कर कर्म करना चाहिए। हमारे देश में भिक्षावृत्ति बहुत बढ़ गई है। अपाहिज को तो छोड़ दीजिए, हट्टे-कट्टे लोग भीख माँग कर अपना आलसी जीवन बिताते हैं। ऐसे लोगों को भीख देने से हम भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहित करते हैं। सरकार द्वारा भिखारी वर्ग के लिए कोई ऐसी योजना चलानी चाहिए जिससे कि उन्हें कुछ रोजगार मिले और भिक्षावृत्ति छूट जाय।

इसी कहावत पर मुझे ध्यान आ रहा है मेरे गाँव के मक्खन सिंह का। वह निहायत ही गरीब था। परिवार में उसकी पत्नी और दो छोटे-छोटे बच्चे थे। कहने को तो उसके पास एक खेत था, लेकिन काम न करने के कारण वह बंजर पड़ा था। वह रोज किसी न किसी से पैसे उधार ले लेता और अपना खर्च चलाता।

वह उधार के नाम पर माँगता, लेकिन गाँव के लोग उसे खैरात समझ कर दे देते। कुछ दिन बाद लोगों ने उसे देना बन्द कर दिया। गाँव के लोग कुछ न कुछ बहाना बनाकर उससे पीछा छुड़ा लेते। भाग्य की बात एक दिन एक साहूकार को रात हो गई और वह मक्खन सिंह के घर पर रुक गया। मक्खन सिंह गरीब तो था, लेकिन उसकी दयानतदारी में कमी न थी।

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उसकी पत्नी ने पड़ोस से खाने का सामान उधार लेकर उस साहूकार के लिए भोजन बनाया और एक कमरे में उसके सोने का प्रबन्ध कर दिया। सुबह होते ही वह सेठ जाने को तैयार हुआ। वह मक्खन सिंह की आवभगत से प्रसन्न हुआ और उसकी ईमानदारी के लिए उसे पाँच सोने की मुहरें दे गया।

मुहरें प्राप्त कर मक्खन सिंह का परिवार बहुत खुश हुआ। उसने उन्हें बेचकर अपने घर पर ही एक छोटी-सी दुकान खोल ली। वह दुकान चल निकली और मक्खन सिंह के वारे-न्यारे होने लगे। अब उसने अपने खेत को भी कराना शुरू कर दिया। अब उसके दिन खुशहाली में बीतने लगे।

लोगों को उसके दिन फिरने पर आश्चर्य हुआ। बात ही बात में लोगों ने उसका रहस्य जान लिया कि उस साहूकार से उसे कुछ धन प्राप्त हुआ था जिसे उसने कारोबार करने में लगा दिया। ईश्वर की कृपा हुई और मक्खन सिंह के भाग्य ने पलटा खाया कि उसे बिन माँगे मोती मिल गए।

(v) चित्र अध्ययन

हमारे देश में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भी वनों का विशेष महत्व है। वृक्षारोपण की आवश्यकता हमारे देश में आदिकाल से ही रही है और आज भी इसकी आवश्यकता ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। आज भी वस्तु-स्थिति उससे बहुत अधिक भिन्न नहीं है। स्थितियों में समय के अनुसार कुछ परिवर्तन तो अवश्य माना जा सकती है। आज भी वस्तु-स्थिति उससे बहुत अधिक भिन्न नहीं है। स्थितियों में समय के अनुसार कुछ परिवर्तन तो अवश्य माना जा सकता है, पर जो वस्तु जहाँ की है, वह वास्तविक शोभा और जीवन-शक्ति वहीं से प्राप्त कर सकती है।

इस कारण वन-संरक्षण की आवश्यकता आज भी पहले के तरह ही ज्यों-की त्यों बनी हुई है। आज जिस प्रकार की नवीन परिस्थितियाँ बन गई हैं, जिस तेजी से नए-नए कल-कारखानों उद्योग-धन्धों की स्थापना हो रही है। नए-नए रसायन, गैसें, अणु, उद्जन, कोर्बोल्ट आदि बमों का निर्माण और निरन्तर परीक्षण जारी है, जैविक शस्त्रास्त्र बनाए जा रहे हैं।

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इन सभी के धुएँ, गैसों और कचरे आदि के निरन्तर निस्सरण से मानव तो क्या सभी तरह के जीव-जन्तुओं का पर्यावरण अत्यधिक प्रदूषित हो गया है। केवल वन ही हैं, जो इस सारे विषैले और मारक प्रभाव से प्राणी जगत् की रक्षा कर सकते हैं। उन्हीं के रहते समय पर उचित मात्रा में वर्षा होकर धरती की हरियाली बनी रह सकती है। हमारी सिंचाई और पेय जल की समस्या का समाधान भी वन-संरक्षण से ही सम्भव हो सकता है।

वन हैं तो नदियाँ भी अपने भीतर जल की अमृत धारा सँजो कर प्रवाहित कर रही है। जिस दिन वन नहीं रह जाएँगे, सारी धरती वीरान, बंजर और रेगिस्तान बन जाएगी। यदि आज की तरह ही निहित स्वार्थों की पूर्ति, अपनी शानो-शौकत दिखाने के लिए वनों का कटाव होता रहा, तो धीरे-धीरे अन्य सभी का भी सुनिश्चित अन्त हो जाएगा। वृक्षारोपण की आवश्यकता इसीलिए होती है कि वृक्ष सुरक्षित रहें।

वनों के अभाव में प्रकृति का संतुलन बिगड़ जायेगा। प्रकृति का संतुलन जब बिगड़ जायेगा तब सम्पूर्ण वातावरण इतना दूषित और अशुद्ध हो जायेगा कि हम न ठीक से साँस ले सकेंगे और न ठीक से अन्न-जल ही ग्रहण कर पाएंगे। इस प्रकार से वृक्षारोपण की आवश्यकता हमें सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करती हुई हमारे जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है। वृक्षारोपण की आवश्यकता की पूर्ति होने से हमारे जीवन और प्रकृति का परस्पर संतुलन क्रम बना रहता है।

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Question 2.
Write a letter in Hindi in approximately 120 words on any one of the topics given below:
निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर हिन्दी में लगभग 120 शब्दों में पत्र लिखिए :
(i) अपने शहर की सड़कों की दुरावस्था की शिकायत करते हुए समाचार-पत्र के सम्पादक को एक पत्र लिखिए।
Answer:
सेवा में,
श्रीमान् सम्पादक महोदय,
दैनिक जागरण,
आगरा
विषय : शहर की सड़कों की दुरावस्था हेतु शिकायत-पत्र
मान्यवर,
आपके दैनिक समाचार-पत्र के माध्यम से सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिकारियों का ध्यान अपने शहर की सड़कों की दुरावस्था की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। आशा है कि आप इस पत्र को प्रकाशित कर अनुगृहीत करेंगे। आगरा एक ऐतिहासिक नगर है। बाहर इसे ‘ताज की नगरी’ कहते हैं। नाम से लगता है कि यह बड़ी सुन्दर नगरी है और व्यवस्थित, चौड़े और सुन्दर राजमार्ग हैं पर स्थिति इसके विपरीत ही है।

सड़कें छोटी और अव्यवस्थित हैं। जगह-जगह गड्ढे हो रहे हैं फलस्वरूप आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। सड़क एक बार बनकर अगले दस वर्ष तक मरम्मत की राह देखती रहती है। सड़कों का रख-रखाव नहीं होता है। स्थान-स्थान पर नल निकालने के लिये सड़कें खोद दी गई हैं उनकी पुनः मरम्मत नहीं हुई है। अन्य सड़कों की तो बात छोड़िए सिविल लाइन्स और माल रोड तक की सड़कें गड्ढों से भरी हुई हैं। सड़कों पर रोशनी की व्यवस्था नहीं है।

आशा है कि सम्बन्धित अधिकारी यथा स्थान सड़कों की मरम्मत करायेंगे और उन पर बिजली की रोशनी की व्यवस्था करेंगे ताकि आए दिन की दुर्घटनाओं से बचा जा सके।
भवदीय
नवल शाह
48, कमला नगर, आगरा।
दिनांक : 15.3.20xx

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(ii) मित्र को पत्र लिखकर उसे वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने के लिए बधाई दीजिए।
Answer:
6, महात्मा गाँधी मार्ग,
आगरा।
दिनांक-20-3-20XX
प्रिय मित्र रोहित,
कल तुम्हारा प्यार-भरा पत्र प्राप्त हुआ। मुझे यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई कि तुम अपने विद्यालय में मनाए गए सांस्कृतिक सप्ताह में हिन्दी वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आए हो। मित्र तुम इसके लिए बधाई के पात्र हो क्योंकि वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय ‘हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में देश के लिए हितकर है’ एक गम्भीर विषय है। तुम्हारा विपक्ष में बोलना और भी मुश्किल विषय है। विपक्ष में बोलते हुए प्रथम आना वास्तव में प्रशंसनीय है।
हमें इस प्रकार की प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहना चाहिए। इससे ज्ञानार्जन तो होता ही है साथ-साथ भाषण देने की कला भी आती है। मैं भी इस तरह की प्रतियोगिताओं में भाग लिया करूँगा। शेष कुशल है। तुम्हारे माता-पिता को मेरा चरण स्पर्श व छोटे भाई को प्यार।
तुम्हारा मित्र,
गौरव सिंह
कक्षा 10

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Question 3.
Read the passage given below and answer in Hindi the questions that follow using your own language as far as possible :
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िये और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए। उत्तर यथासम्भव आपकी भाषा में होने चाहिए।
विदिशा नामक राज्य में एक सुरम्य वन था। उस वन का प्राकृतिक वैभव तथा असाधारण सौन्दर्य देखने के योग्य था। उसकी प्राकृतिक छटा को देखकर ऐसा लगता था मानो प्रकृति ने उस वन को अपूर्व सौन्दर्य, असीम सुख और अनुपम शान्ति का वरदान दिया हुआ हो।

उस वन में एक दयालु एवं परोपकारी सन्त का आश्रम था। आश्रम में एक बहुत बड़ा सरोवर था। वन के हिंसक और अहिंसक सभी पशु-पक्षी उस आश्रम में विश्राम करते थे। जंगल के हिंसक जीव-जन्तु भी सन्त की संगति में अहिंसक की तरह आचरण करते थे तथा पारस्परिक शत्रुता को भूलकर उस सरोवर में एक साथ एक ही घाट पर पानी पीते थे। राजा के आदेश से वहाँ शिकार करने पर कठोर प्रतिबन्ध था।

एक दिन राजा का एकमात्र पुत्र युवराज शिकार की तलाश में आश्रम में आ पहुँचा। वहाँ उसने एक मृग शावक पर अपना निशाना साधा। यह दृश्य देखकर सन्त बोला—’ठहरो युवराज ! यह निर्दोष, मूक मृग शावक इस आश्रम का निवासी है। यह निर्भीक होकर यहाँ विचरण करता है। आपके पिताजी की ओर से यहाँ शिकार करने पर प्रतिबन्ध है। आप उनके आदेश का उल्लंघन मत कीजिए।’
युवराज को सन्त की सलाह बुरी लगी। उसने क्रोध में आकर कहा—’मुझे आखेट करने से रोकने वाले तुम कौन हो ?’

सन्त ने विनम्र भाव से उत्तर दिया ‘यह राज्य आपका है। आप इसके स्वामी हैं। मैं तो आपको आपके पिता के आदेश का स्मरण करा रहा हूँ’, किन्तु सन्त की बात को अनसुना कर युवराज मृग शावक पर निशाना साधने लगा। इस पर सन्त युवराज के बाण के सामने खड़े होकर कहने लगे—’नहीं, युवराज ! मुझे मारने के बाद ही मृग शावक को अपना निशाना बना सकते हो।’ सन्त की बातों ने आग में घी का काम किया। युवराज क्रोध में आग बबूला हो उठा और उसने सन्त को अपने बाण का निशाना बना डाला।

सन्त की मृत्यु से सारा राज्य शोक-सागर में डूब गया। राजा ने युवराज को बन्दी बनाकर सामने लाने को कहा। बन्दी युवराज से राजा ने पूछा—’तुमने सन्त की हत्या की ?’ ‘वह उद्दण्ड था, मेरे शिकार में बाधा डाल रहा था।’ युवराज ने उत्तर दिया। राजा ने कठोर स्वर में पूछा-‘तुमने सन्त की हत्या की या नहीं ?’ युवराज ने उत्तर दिया—’हाँ, मैंने ही उसकी हत्या की।’

युवराज का उत्तर सुनते ही महाराज का हाथ तलवार पर गया। यह देखकर दरबारी हाथ जोड़कर बोले-‘राजन् ! युवराज प्रजा की आँखों का तारा है। सिंहासन का एकमात्र अधिकारी है इसलिए इन्हें क्षमा कर दें।’ राजा ने कहा—’जो व्यक्ति एक त्यागी सन्त महात्मा का हत्यारा हो सकता है, वह सिंहासन का उत्तराधिकारी कदापि नहीं हो सकता। कौन कहता है, यह मेरा एकमात्र उत्तराधिकारी है ? राज्य का हर सपूत—जिससे राज्य का सिर ऊँचा होता है, सिंहासन का उत्तराधिकारी होता है। न्याय सबके लिए समान है। मेरे न्याय में पुत्र-मोह आड़े नहीं आ सकता। युवराज ने हमारे कुल पर धब्बा लगाया है। वह हत्यारा है और हत्यारे की सजा मौत होती है।’ और देखते ही देखते राजा की तलवार से युवराज का सिर धड़ से अलग हो गया।
(i) सन्त का आश्रम कहाँ था ? उस आश्रम की क्या विशेषताएँ थीं?
(ii) युवराज का सन्त के आश्रम में आने का क्या प्रयोजन था ? आश्रम में आकर उसने क्या किया ? सन्त ने उसे क्या कहा?
(iii) युवराज ने सन्त को क्यों मार डाला? युवराज का यह करना उचित था अथवा अनुचित, क्यों?
(iv) सन्त की मृत्यु से राज्य पर क्या प्रभाव हुआ ? राजा ने युवराज को बन्दी बना कर क्या प्रश्न किए ? युवराज ने प्रश्नों के क्या उत्तर दिए ?
(v) युवराज के उत्तर को सुनकर राजा क्या करना चाहता था ? दरबारियों ने राजा से क्या निवेदन किया ? राजा ने दरबारियों से क्या कहा तथा अन्त में क्या न्याय किया ?
Answer:
(i) विदिशा नामक राज्य में एक सुरम्य वन था। उस वन में एक दयालु एवं परोपकारी सन्त का आश्रम था। उस आश्रम में एक बहुत बड़ा सरोवर था। वन के हिंसक और अहिंसक सभी पशु-पक्षी उस आश्रम में विश्राम करते थे। उस आश्रम की प्राकृतिक छटा अत्यन्त सुन्दर थी।

(ii) विदिशा राज्य का राजकुमार शिकार खेलने के लिए आश्रम में आया था। उसने एक मृग शावक पर निशाना साधा। सन्त ने उससे कहा, ‘ठहरो युवराज यह निर्दोष मृग शावक इस आश्रम का निवासी है। आपके पिताजी की ओर से यहाँ शिकार करने पर प्रतिबन्ध है। आप उनके आदेश का उल्लंघन मत कीजिए।’

(iii) जब युवराज मृग शावक को तीर मारने वाला था तो सन्त उसके तीर के सामने आकर खड़ा हो गया और युवराज से कहा कि तुम्हें मृग शावक को मारने से पहले मुझे मारना पड़ेगा। युवराज को क्रोध आ गया और उसने वह तीर सन्त को मार दिया। निर्दोष सन्त की हत्या करना अनुचित था। सन्त के आश्रम में राजा की आज्ञा से पशु-पक्षियों का शिकार करना वर्जित था। सन्त का यह कर्त्तव्य था कि वह किसी शिकारी को पशु-पक्षियों को मारने न दे, लेकिन युवराज के द्वारा सन्त का मारा जाना अनुचित और निन्दनीय था।

(iv) सन्त की मृत्यु से सारा राज्य शोक से भर गया। राजा ने युवराज को बन्दी बना लिया और उससे पूछा- क्या तुमने सन्त की हत्या की?’ युवराज ने उत्तर दिया-‘वह उद्दण्ड था, मेरे शिकार में बाधा डाल रहा था। राजा ने क्रोध में आकर फिर पूछा, ‘तुमने सन्त की हत्या की या नहीं ?’ तब युवराज ने उत्तर दिया, ‘हाँ, मैंने ही उसकी हत्या की।’

(v) युवराज का उत्तर सुनकर युवराज को दण्ड देने के लिए राजा का हाथ तलवार पर आ गया। यह देखकर दरबारी हाथ जोड़कर बोले कि युवराज प्रजा की आँखों का तारा है और सिंहासन का एकमात्र अधिकारी है। इन सब बातों को देखते हुए उसे क्षमा कर दें, लेकिन राजा को तो न्याय करना था। उसने तलवार लेकर युवराज का सिर धड़ से अलग कर दिया। राजा न्यायप्रिय था उसका पुत्र-मोह उसके न्याय के मार्ग में नहीं आया।

ICSE Class 9 Hindi Sample Question Paper 2 with Answers

Question 4.
Answer the following according to the instructions given :
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर निर्देशानुसार लिखिए
(i) निम्नलिखित शब्दों से विशेषण बनाइए
राष्ट्र, नवीनता।
Answer:
राष्ट्र – राष्ट्रीय
नवीनता – नवीन

(ii) निम्नलिखित शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाइए
कहना, जीतना।
Answer:
कहना – कहावत
जीतना – जीत ।

(iii) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए
निर्माण, उपलब्ध।
Answer:
निर्माण – ध्वस्त
उपलब्ध – अनुपलब्ध

(iv) निम्नलिखित अंशों में से किसी एक को अपने वाक्य में प्रयोग कीजिए
(क) आँचल में समेटे हैं,
(ख) हँसी-खुशी।
Answer:
(क) भारत का प्राचीन इतिहास विभिन्न संस्कृतियों को अपने आँचल में समेटे हुए है।
(ख) सब लोग हँसी-खुशी अपने-अपने घर चले गए।

(v) निम्नलिखित में से किसी एक शब्द के दो पर्यायवाची शब्द लिखिए–
बाग, भ्रम।
Answer:
बाग – बगीचा, उपवन
भ्रम – शक, संदेह

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(vi) कोष्ठक में दिए गए निर्देशानुसार वाक्यों में परिवर्तन कीजिए
(a) पहाड़ के गाँव कभी अपनी लोक-कलाओं के लिये जाने जाते थे। (‘अपनी’ से प्रारम्भ करें)
(b) परिवर्तन की इस लहर ने भवन-निर्माण शैली को भी प्रभावित किया है।
(भवन-निर्माण शैली भी “से प्रारम्भ करें)
(c) कुछ घरों में पशुओं के लिये नीचे व्यवस्था की जाती है। (पशुओं की से प्रारम्भ करें)
Answer:
(a) अपनी लोक-कलाओं के लिए कभी पहाड़ के गाँव में जाने जाते थे।
(b) भवन-निर्माण शैली भी इस परिवर्तन की लहर से प्रभावित हुई है।
(c) पशुओं के लिए कुछ घरों में नीचे व्यवस्था की जाती है। पशुओं की व्यवस्था घर के नीचे की जाती है।

Section-B
साहित्य सागर (संक्षिप्ति कहानियाँ)

Question 5.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
बालक कुछ ठहरा। मैं असमंजस में रहा। तब वह प्रेत गति से एक ओर बढ़ा और कुहरे में मिल गया। हम भी होटल की ओर बढ़े। हवा तीखी थी—हमारे कोटों को पार कर बदन में तीर-सी लगती थी।
— ‘अपना अपना भाग्य’ —
लेखक-जैनेन्द्र कुमार
(i) यहाँ किस लड़के के बारे में लेखक कह रहा है। प्रेत गति से क्या तात्पर्य है ?
(ii) लेखक असमंजस में क्यों है ?
(iii) ठण्डी हवा कैसी लग रही थी? वे दोनों कहाँ गये।
(iv) मित्र ने उस समय क्या कहा और लेखक ने क्या उत्तर दिया ? फिर उदास होकर मित्र ने क्या कहा?
Answer:
(i) नैनीताल की सर्द शाम का समय है। लेखक और उसका मित्र एक बैंच पर बैठे थे। जिस लड़के के बारे में कहा गया है वह एक पहाड़ी गरीब लड़का है जो अपने गाँव से भोजन के अभाव के कारण शहर भाग आया है और यहाँ किसी दुकान पर काम करता है। तीन गज की दूरी से उन्हें दिख पड़ा, एक लड़का सिर के बड़े-बड़े बाल खुजलाता चला आ रहा था। नंगे पैर, नंगे सिर, एक मैली-सी कमीज लटकाए है। प्रेत गति का मतलब होता है बहुत तीव्र गति से।

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(ii) लेखक असमंजस में यह सोचकर है कि इतनी अधिक ठण्डी में बिना कपड़ों के ये लड़का कैसे रात काटेगा? उनके प्रयास करने पर भी उनके होटल में ही ठहरे वकील साहब ने उसे काम पर नहीं रखा। यदि उसे नौकरी मिल जाती तो उसका कष्ट कम हो जाता।

(ii) ठण्डी हवा तीर की भाँति उनके बदन में लग रही थी। ऊनी कोट भी उस बर्फीली हवा से रक्षा नहीं कर पा रहे थे। वे दोनों वहाँ से उठकर अपने होटल की तरफ चल दिये।

(iv) ठण्डी से सिकुड़ते हुए मित्र ने लेखक से कहा कि भयानक शीत है और उस लड़के के पास बहुत कम कपड़े हैं। लेखक ने लापरवाही से कहा कि ‘यह संसार है’ हम क्या कर सकते हैं। पहले बिस्तर में गरम हो लें फिर किसी और की चिन्ता करेंगे। यह सुनकर मित्र उदास हो गया और कहा कि इसे लाचारी कहो, निठुराई कहो या बेहयाई।

Question 6.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
“मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा-सा चश्मा रखा हुआ था, जैसा बच्चे बना लेते हैं। हालदार साहब भावुक हैं। इतनी सी बात पर उनकी आँखें भर आईं।”
— ‘नेताजी का चश्मा’ —
लेखक-स्वयं प्रकाश
(i) किसकी मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना चश्मा लगा था ?
(ii) यह चश्मा किसने लगाया होगा और क्यों ?
(iii) हालदार साहब यहाँ क्यों रुके ?
(iv) भावुक व्यक्ति कौन होता है उसके लक्षण बताइए?
Answer:
(i) सुभाष चन्द्र बोस अर्थात् नेताजी की मूर्ति पर सरकंडे से बना चश्मा लगा था।
(ii) यह चश्मा कस्बे के किसी देशप्रेमी ने लगाया होगा। वह कोई बच्चा हो सकता है या कोई उस कस्बे का नागरिक हो सकता है, क्योंकि उसको बिना चश्मे की मूर्ति अच्छी नहीं लगी, क्योंकि नेताजी हमेशा चश्मा लगाते थे।

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Question 7.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिएः
“लोग बड़ी कठिनता से उसे हटा पाये। काकी के दाह-संस्कार में उसे नहीं जाने दिया। एक दासी राम-राम करके उसे घर पर ही सँभाले रही।”
— काकी —
लेखक-सियारामशरण गुप्त

(i) लोग कठिनता से किसे हटा पाये तथा वहाँ क्या हुआ था?
(ii) ‘दासी राम-राम करके उसे घर पर ही सँभाले रही’ इस पंक्ति को समझाइए ?
(iii) किसी अपने प्रिय के गुजर जाने पर बच्चे पर क्या असर पड़ता है ?
(iv) बुद्धिमान गुरुजनों ने उस बच्चे को क्या बताया तथा उसे सत्य का पता कैसे लगा?

साहित्य सागर (पद्य)

Question 8.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिएः
“राजा के दरबार में, जैये समया पाय।
साईं तहाँ न बैठिये, जहँ कोउ देय उठाय।।
जहँ कोउ देय उठाय, बोल अनबोले रहिए।
हँसिये नहीं हहाय, बात पूछे ते कहिये।।”
-‘कुंडलियाँ’कवि–
गिरधर कविराय

(i) ये कुंडलियाँ बहुत लोकप्रिय हैं—कैसे ?
(ii) कवि ने किसको अपना विषय बनाया है ?
(iii) राजा के दरबार में कैसा व्यवहार करना चाहिए ?
(iv) इन पंक्तियों का भावार्थ लिखिए।
Answer:
(i) कविराय गिरधर की कुंडलियाँ जनमानस में बहुत लोकप्रिय हैं। इनकी कुंडलियाँ नीति पर आधारित हैं। इस लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है बिल्कुल सरल, सहज़, व्यावहारिक तथा सीधी-सादी भाषा में गम्भीर तथा नीतिपरक तथ्यों का कथन।।

(ii) कवि ने नीति, वैराग्य और आध्यात्म को ही अपनी कविता का विषय बनाया है। जीवन के व्यावहारिक पक्ष का इनके काव्य में प्रभावशाली वर्णन मिलता है जिसकी पैठ जनमानस में बहुत गहरी है।

(iii)राजा के दरबार में बिना बुलाये नहीं जाना चाहिए। हमें उस स्थान पर नहीं बैठना चाहिए जहाँ से कि कोई उन्हें उठा सकता है। बिना किसी के पूछे बोलना नहीं चाहिए और जोर से ठहाका मारकर हँसना नहीं चाहिए।

(iv) कवि कहता है कि राजा के दरबार में तभी जाना चाहिए जब बुलाया जाये और समय से पहुँचना चाहिए। उस स्थान पर नहीं बैठना चाहिए जहाँ से कोई उठा दे। बिना पूछे कोई बात नहीं करनी चाहिए और ठहाका मारकर नहीं हँसना चाहिए क्योंकि यह असभ्यता मानी जाती है।

Question 9.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:

“लेकिन विघ्न अनेक अभी
इस पथ पर अड़े हुए हैं
मानवता की राह रोककर
पर्वत खड़े हुए हैं।”
-‘स्वर्ग बना सकते हैं
कवि-रामधारी सिंह ‘दिनकर’
(i) कवि ने इस कविता में क्या इच्छा व्यक्त की है ? क्या यह कविता ‘राष्ट्रप्रेम’ को प्रदर्शित करती है ?
(ii) कौन से पथ पर विघ्न अड़े हुए हैं तथा उनको कैसे दूर किया जा सकता है ?
(iii) अपने देश के लिए हमारे क्या कर्तव्य हैं ?
(iv) इन पंक्तियों का भावार्थ लिखिए।
Answer:
(i) कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने इस कविता में यह इच्छा व्यक्त की है कि हम प्रयत्न करें तो इस देश को स्वर्ग के समान बना सकते हैं। इसके लिए परस्पर प्रेमभाव, सहयोग, एकता, न्याय और सुख का समभाव होना आवश्यक है। सभी मिलकर विकास की ओर कदम बढ़ाये। यह कविता राष्ट्रीयता से प्रेरित है।

(ii) हमारे विकास के पथ पर विघ्न-बाधाएँ खड़ी हुई हैं। हम अपने सच्चे उद्यम से उनको दूर कर सकते हैं। हर काम में बाधाएँ आती हैं, लेकिन सच्चा कर्मवीर वही है जो उनको पार करके आगे बढ़ता है। ईश्वर भी उसी व्यक्ति की सहायता करता है जो वीरता से अपने सच्चे पथ पर आगे बढ़ता है।

ICSE Class 9 Hindi Sample Question Paper 2 with Answers

(iii) अपने देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। हम प्राण देकर भी अपने देश की रक्षा करते हैं। अपने देश को उन्नति के पथ पर ले जाने के लिए एकता, परस्पर सहयोग, सहिष्णुता और देश प्रेम की आवश्यकता है। देश की आवश्यकतानुसार हम फौज में भर्ती होकर देश की रक्षा का प्रण लें।

(iv) कवि कहता है कि मनुष्य के विकास के पथ पर अनेक विघ्न आकर खड़े हो गये हैं और मानवता का रास्ता रोके अनेक रुकावटें पर्वतों के समान अडिग होकर खड़ी हुई हैं। लेकिन सच्चा वीर इन बाधाओं को पार करता हुआ मानवता की राह में आगे बढ़ता है। कहते हैं कि कर्मवीर के सामने से बाधाएँ ऐसे उड़ जाती हैं जैसे आँधी में तिनका।

Question 10.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
“ऊँचा खड़ा हिमालय,
आकाश चूमता है, नीचे चरण तले पड़, नित सिन्धु झूमता है।
गंगा, यमुना, त्रिवेणी, नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली, पग-पग पर छहर रही हैं।”
— ‘वह जन्मभूमि मेरी’ —
कवि-सोहन लाल द्विवेदी
(i) हिमालय को क्या कहा जाता है ? इसकी सुन्दरता का वर्णन करिये।
(ii) हिमालय से हमारे देश को क्या-क्या लाभ हैं ?
(iii) गंगा, यमुना कहाँ से निकलती हैं ? त्रिवेणी का क्या हुआ तथा ये नदियाँ कहाँ आकर मिलती हैं ?
(iv) प्रस्तुत पंक्तियों का भावार्थ लिखिए।
Answer:
(i) हिमालय पर्वत अति प्राचीन और अति सुन्दर है। प्रकृति की छटा यहाँ पर दर्शनीय है। चारों ओर बर्फ से ढंकी हुई इसकी चोटियों की छटा अत्यन्त मनोरम है। यह भारत के उत्तर में स्थित है तथा इसको भारतमाता का मुकुट कहा जाता है। धार्मिक पुस्तकों में भी इसका अभूतपूर्ण वर्णन है। इस पर स्थित कैलाश पर्वत पर भगवान शिव का निवास है। ‘मान सरोवर’ की यात्रा यहाँ के भक्तजन करते हैं।

(ii) हिमालय पर्वत हमारे देश की उत्तर दिशा में एक सबल प्रहरी की तरह खड़ा है। इससे भारत को अनेक लाभ हैं। यहाँ से निकली हुई नदियाँ भारतभूमि की सिंचाई करती हैं और पीने का पानी देती हैं। उत्तर से आने वाले आक्रमणकारियों से हिमालय भारत की रक्षा करता रहा है। अधिक ऊँचा होने के कारण प्राचीनकाल में आक्रान्ता इसे पार नहीं कर पाते थे। यहाँ पर अनेक दर्शनीय स्थल, धार्मिक

स्थल और सैलानियों के लिए ठहरने के सुन्दर स्थान हैं। गर्मी से राहत पाने के लिए धनी लोग यहाँ आकर ठहरते हैं। यहाँ अनेक वन हैं जिनमें बहुमूल्य लकड़ियाँ और जड़ी-बूटी मिलती हैं। यहाँ की चोटियाँ बादलों को आकर्षित कर वर्षा कराती हैं। सबसे ऊँची चोटी ‘ऐवरेस्ट’ यहाँ का गौरव है। यहाँ अनेक तीर्थस्थान हैं। यहाँ की गुफाओं में आज भी ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं। यहाँ के मान सरोवर का धार्मिक महत्व है।

(iii) पवित्र नदी गंगा हिमालय के गोमुख स्थान से गिरकर गंगोत्री में आती है और फिर वहाँ से आगे बढ़ती है, जबकि यमुना का स्रोत ‘यमुनोत्री’ से है। कहते हैं पहले तीसरी नदी त्रिवेणी भी हिमालय से निकलकर मैदान में आती थी और इलाहाबाद में ‘संगम’ पर तीनों नदियाँ मिलती थीं। अन्तराल में सरस्वती नदी का लोप हो गया और वह धरती के नीचे चली गईं। अब ‘संगम’ पर मिलने वाली नदियाँ दो हैं- गंगा और यमुना। गंगा का सफेद जल और यमुना का सांवला जल साफ-साफ नजर आता है।

(iv) कवि सोहनलाल द्विवेदी कहते हैं यह जन्मभूमि मेरी है जहाँ ऊँचा पर्वत हिमालय खड़ा हुआ है जो आकाश को चूम रहा है। यह भारतमाता के मुकुट की तरह शोभित है और दक्षिण में हिन्द महासागर भारत माता के चरण धो रहा है। गंगा, यमुना, त्रिवेणी नदियाँ हर्षित होकर बह रही हैं। इसकी सुन्दर छटा अनुपम और दर्शनीय है।
नया रास्ता

नया रास्ता

Question 11.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए :
“सड़क पर घोर अंधकार था। शायद सड़क पर लगी बिजली की ट्यूबें खराब हो गई थीं। अंधकार में मीनू अशोक के पीछे-पीछे चलने लगी, मीनू का पैर एक पत्थर पर पड़ने से उसका सन्तुलन बिगड़ गया। तभी उसने अपने को सँभाला, दो कदम पर उसका घर था।”
(i) मीनू कहाँ से आ रही है ? उसे देर क्यों हो गई ?
(ii) वह वहाँ क्यों गई थी ? उसे अपनी सहेली से मिलकर कैसा लगा?
(iii) उसकी सहेली ने अपने भाई को उसके साथ क्यों भेजा ?
(iv) अशोक को देखकर पिताजी ने क्या कहा ? मीनू फिर कहाँ चली गई ?
Answer:
(i) मीनू नीलिमा के घर से आ रही थी। उसे देर इसलिए हो गई क्योंकि नीलिमा की माँ ने उससे खाना खाकर जाने को कहा। अतः उसको रुकना पड़ा। नीलिमा ने भी उससे आग्रहपूर्वक खाना खाकर ही जाने की बात कही।

(ii) मीनू को अपनी सहेली नीलिमा से मिले हुए बहुत दिन हो गये थे। इसलिए वह उससे मिलने उसके घर गई। नीलिमा से मिलकर उसे बहुत अच्छा लगा। मीनू के आते ही नीलिमा ने उसे गले से लगा लिया। ऐसा लग रहा था कि मानों दोनों सहेलियाँ एक लम्बे समय के बाद मिल रही हों।

(iii) खाना बनने और मीनू के खाना खाने से रात को 10 बज गये थे। मीनू को डर था कि कहीं उसके पिताजी व माँ इतनी रात गये लौटने पर नाराज न हों। तभी नीलिमा ने अपने भाई अशोक को बुलाया और उससे कहा कि वह मीनू को घर तक छोड़कर आये।

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(iv) अशोक को देखकर पिताजी ने बड़े प्रेम से उसे बुलाया और बैठने को कहा, परन्तु रात अधिक हो जाने के कारण उसने बैठने के लिए इन्कार कर दिया और अभिवादन कर चला गया। इधर मीनू सीधे अपनी माँ के कमरे में गई और कुछ देर दोनों बात करती रहीं। फ़िर मीनू को नींद आ गई और वह सो गई।

Question 12.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
“यद्यपि मीनू ने कत्थक नृत्य बचपन में सीखा था, परन्तु वह शुरू से ही अपने स्कूल में व फिर बड़े होने पर कॉलेज में नृत्य का कार्यक्रम देती रही। इसलिए अभी भी कत्थक काफी कुशलतापूर्वक कर लेती थी। हमेशा अपने कत्थक नृत्य में पुरस्कार लिए थे।”
(i) सहेलियों ने मीनू के सामने क्या प्रस्ताव रखा ?
(ii) वह इस प्रस्ताव के लिए मना क्यों नहीं कर सकी?
(iii) वह लेटे-लेटे किन स्मृतियों में खो गई ?
(iv) हर कार्य में मीनू की प्रतिभा मुखरित हो उठती ? कैसे ?
Answer:
(i) हॉस्टल में मीनू को देखकर सभी सहेलियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। एक बार उसने बातों-बातों में माया के सामने कहा था कि उसने कत्थक नृत्य सीखा है। माया ने ही यह प्रस्ताव रखा कि मीनू का कत्थक नृत्य कॉलेज के वार्षिकोत्सव में कराया जाये। उसकी सभी सहेलियों ने आकर उसके सामने कत्थक नृत्य करने का प्रस्ताव रखा।

(ii) सभी सहेलियों के बहुत आग्रह के कारण मीनू नृत्य करने के लिए मना न कर सकी। यद्यपि वह इन सब बातों में विशेष रुचि नहीं रखती थी। इस समय उसके सामने एक ध्येय था, एक मंजिल थी, जिस पर पहुँचने के लिए उसे विशेष परिश्रम की आवश्यकता थी और फिर नीलिमा की शादी में भी उसके तीन दिन बेकार हो गये थे।

(iii) मार्ग की थकान के कारण वह अपने कमरे में आकर लेट गई। लेटे-लेटे वह अतीत की स्मृतियों में खो गई। उसने बचपन में ही कत्थक नृत्य सीखा था। उसके कस्बे में एक कत्थक नृत्य का स्कूल खुल गया था। वहाँ उसने नृत्य सीखा और अपने स्कूल में भी इस नृत्य का कार्यक्रम दिया था।

(iv) हर कार्य में मीनू की प्रतिभा मुखरित हो उठती। वह हर कार्य लगन के साथ करती। कत्थक नृत्य में भी उसने पूर्ण रुचि दिखाई। दो वर्ष में ही वह कत्थक नृत्य में निपुण हो गई थी। बाद में भी स्कूल में वह निरन्तर नृत्य करती रही, जिससे उसका अभ्यास निरन्तर बना रहा।

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Question 13.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए :
अपने जीवन की परिस्थितियों से विवश होकर मीनू के हृदय में कई बार हीन भावनाएँ उत्पन्न हुईं। कई बार उसे ऐसा आभास हुआ कि उसका जीवन बिल्कुल व्यर्थ है, परन्तु मीनू जैसी योग्य तथा होनहार युवती के लिए ऐसी भावनाएँ उचित नहीं थीं।
(i) मीनू के हृदय में हीन भावनाएँ क्यों उत्पन्न हुईं ? ।
(ii) मेरठ से जो पत्र आया उसमें क्या लिखा था?
(iii) आशा का रिश्ता मेरठ वालों ने माँगा तो मीन ने अपने घर में क्या कहा?
(iv) दयाराम के घरवालों का हृदय मायाराम जी के परिवार के प्रति घृणा से क्यों भर गया ?
Answer:
अपने जीवन की परिस्थितियों को देखते हुए कई बार मीनू का हृदय हीन-भावना से भर गया। मीनू पढ़ी-लिखी है, अच्छे संस्कारों वाली है और सुन्दर है, फिर भी कई लड़कों द्वारा वह नापसन्द कर दी गई है। वह अपने को अपमानित महसूस करती है। दृढ़ता और साहस की मूर्ति होते हुए भी कभी-कभी हीन-भावना उसके हृदय में भर जाती है और वह दुःखी हो जाती है।

(ii) मेरठ से लड़के वालों के यहाँ से जो पत्र आया उसमें लिखा था कि वे लोग मीनू के बजाय उसकी छोटी बहन आशा से शादी कर सकते हैं। यदि आपको स्वीकार हो तो खबर कर दें। इस पत्र को पढ़कर सभी लोग उदास हो गये।

(iii) मीनू की छोटी बहन मीनू से सुन्दर थी, लेकिन वह अभी छोटी थी। कायदे से पहले मीन का विवाह होना चाहिए उसके बाद आशा का नम्बर आता है। मीनू का विचार था कि यदि मेरठ वालों ने आशा का रिश्ता माँगा है तो हमें कर देना चाहिए। आखिर आशा का विवाह भी तो करना ही है। मीनू की बात उसके पिताजी और माताजी को पसन्द आई और आशा का रिश्ता मेरठ वालों से करने का मन बना लिया।

(iv) दयारामजी मेरठ आशा के रिश्ते की बात करने गये, लेकिन वहाँ उन्हें पता चला कि किसी धनवान व्यक्ति की लड़की से उनका रिश्ता करीब-करीब पक्का हो गया है। दयारामजी उदास होकर लौट आये। घर पहुँचने पर दयारामजी का उदास चेहरा देखकर सभी समझ · गये कि आशा के रिश्ते के लिए भी मना हो गई है। जब उन्हें असलियत पता चली तो सबका हृदय मायारामजी के परिवार के प्रति घृणा से भर गया।

एकांकी संचय

Question 14.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
“हाँ माताजी उन्होंने यही कहा था। मुझे भी अचरज हुआ। मैंने पूछा, वे यहाँ आते हैं ? तो हँसकर बोली, डरो नहीं। वे यहाँ भाई के पास नहीं आते, दफ्तर के काम से आते हैं।”
—’संस्कार और भावना’ —
लेखक-विष्णु प्रभाकर
(i) यह कथन किसने, किससे और किसके बारे में कहा है ?
(ii) जिसके बारे में वक्ता बता रही है उससे पहले उसकी क्या बातें हुई हैं ?
(iii) कौन बीमार रहा है और वह कैसे बचा ?
(iv) वक्ता का अन्तर्मन क्यों काँपने लगा था ?
Answer:
(i) यह कथन माँ की छोटी बहू उमा का है और माँ से कहा गया है। यह कथन माँ के बड़े लड़के अविनाश की पत्नी के लिए कहा गया

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(ii) उमा की इससे पहले अपनी जेठानी से बातें हुईं। जेठानी ने कहा कि वह अपने पति से बहुत प्यार करती है। यद्यपि माँ-बेटे का सम्बन्ध सबसे बड़ा होता है, लेकिन पति को दुःखी करके वह किसी और को खुश करने की कल्पना भी नहीं कर सकती। वह अपने पति को बहुत चाहती है। वह उसके विरुद्ध जाकर कोई काम नहीं कर सकती।

(iii) माँ का बड़ा बेटा अविनाश बहुत बीमार रहा है। उसकी बहू ने हर प्रकार से उसकी सेवा कर उसे बचा लिया। वह घर का सब काम भी करती थी और बाजार से दवा भी लाती थी। एक दो बार मिसरानी से दवा मँगाई थी वरना तो वह स्वयं ही दवा लाती थी। उसका पूरा ध्यान अविनाश पर ही रहता था। उसकी लगन और सेवा से ही अविनाश स्वस्थ हुआ है।

(iv) उमा ने माँ को बताया कि एक दिन वह उनसे (जिठानी) लड़ने गई थी कि उन्होंने बेटे को माँ से अलग कर दिया है, लेकिन उनके तर्कों के सामने वह कुछ न कह सकी। उसका अन्तर्मन काँपने लगा क्योंकि उनके प्रति उसके मन में मोह छा गया है। जैसे मोहग्रस्त . आदमी होता भी है और नहीं भी होता है। उसके बाद वह (उमा) वहाँ से चली आई।

Question 15.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिएः
“अब भी आँखें नहीं खली ? जो व्यवहार अपनी बेटी के लिए तुम दूसरों से चाहते हो वही दूसरे की बेटी को भी दो। जब तक बहू और बेटी को एक-सा नहीं समझोगे, न तुम्हें सुख मिलेगा और न शान्ति।”
—’बहू की विदा’
लेखक-विनोद रस्तोगी

(i) यह कथन किसका है और किससे कहा गया है ? वक्ता ने ऐसा क्यों कहा?
(ii) इस कथन में कितनी सत्यता है। क्या इससे दहेज की समस्या कुछ कम होगी?
(iii) “अब भी आँखें नहीं खुलीं” से क्या तात्पर्य है ?
(iv) अन्त में क्या निर्णय लिया गया ?
Answer:
(i) यह कथन राजेश्वरी का है और अपने पति जीवनलाल से कहा गया है। राजेश्वरी ने उनसे ऐसा इसलिए कहा कि वह अपनी बहू को उसके भाई के साथ मायके नहीं भेज रहे थे क्योंकि उन्होंने शादी में उनको कम दहेज दिया था।

(ii) इस कथन में कि बहू को अपनी बेटी के समान समझना चाहिए यह एक सत्य विचार है, पर ऐसा होता नहीं है। बहुत कम लोग इसको स्वीकार कर पाते हैं। अधिकतर संख्या तो धन के लोभियों की है जो दहेज न मिलने के कारण बहू को अपमानित करते हैं। यदि सभी लोग इस बात को स्वीकार कर लें कि बहू और बेटी एक समान हैं, उनसे वो ही व्यवहार किया जाये जो बेटी से करते हैं तो दहेज की समस्या किसी हद तक कम हो सकती है।

(iii) “अब भी आँखें नहीं खुलीं” से तात्पर्य यह है कि जीवनलाल को अब तो समझ आ जानी चाहिए कि उनकी बेटी को भी उसकी ससुराल वालों ने कम दहेज मिलने के कारण मायके नहीं भेजा है। उनका बेटा जो बहन को लिवाने गया था, अकेला वापस लौट आया था। यही गलती वह अपनी बहू को उसके भाई के साथ न भेजकर कर रहे हैं।

(iv) अन्त में जीवनलाल को समझ आई कि उसे यह गलती नहीं करनी चाहिए। मनुष्य को इतना उदार तो होना ही चाहिए तथा इसी तरह हम बुरों के साथ अच्छे बनकर समाज में सकारात्मकता ला सकते हैं। उन्होंने बहू के भाई प्रमोद से अपनी बहन को ले जाने के लिए कह दिया।

Question 16.
Read the extract given below and answer in Hindi the questions that follow :
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए:
“और तुम जानते हो कि महाराणा इस गढ़ को जीतकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करना चाहते हैं, किन्तु क्या हम लोग अपनी मातृभूमि का अपमान होने देंगे?”
— ‘मातृभूमि का मान’ —
लेखक — हरिकृष्ण ‘प्रेमी’

(i) यहाँ कौन किससे वार्ता कर रहा है और किस सन्दर्भ में?
(ii) वक्ता का परिचय दीजिए। वह इस समय कहाँ पर है ?
(iii) दूसरे साथी के ‘नकली बूंदी कहने पर वक्ता ने क्या जवाब दिया ?
(iv) तीसरे साथी का विचार क्या था ?
Answer:
(i) यहाँ पर राणा का वीर सिपाही वीरसिंह अपने साथी से बात कर रहा है। वह यहाँ बूंदी के नकली दुर्ग की रक्षा के लिए अपने साथियों के साथ तैनात है। बूंदी के दुर्ग के सन्दर्भ में ही वह बात कर रहा है।

(ii) वक्ता वीरसिंह महाराणा लाखा की मेवाड़ सेना का वीर सिपाही है। वह एक राजपूत है और राणा के यहाँ नौकरी करता है। वह बूंदी का रहने वाला देशभक्त सिपाही है, वह राणा की सेना में है, लेकिन इस समय उसे बूंदी के नकली किले की सुरक्षा में कुछ साथियों के साथ रखा गया है और उसको यह निर्देश दिया गया है कि लड़ाई नकली होगी और थोड़े समय बाद बूंदी के नकली किले पर अधिकार कर लिया जायेगा।

(iii) दूसरे साथी ने वीरसिंह को समझाना चाहा कि यह दुर्ग तो नकली है, हमें इस नकली दुर्ग के लिए ऐसा नहीं सोचना चाहिए। तब सच्चे मातृभक्त वीरसिंह ने उसे धिक्कारा और कहा कि नकली बूंदी भी प्राणों से प्रिय है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं किया जा सकता। आज महाराणा देखेंगे कि यह खेल ही नहीं रहेगा, बल्कि यह भूमि सिसोदियों और हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगी।

(iv) वीरसिंह के तीसरे साथी का विचार यह था कि हम लोग महाराणा के नौकर हैं। महाराणा के विरुद्ध तलवार उठाना उचित नहीं है। उनका शरीर महाराणा के नमक से बना है। उन्हें महाराणा की इच्छा में बाधा उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। स्वामिभक्त होने के नाते उसका विचार भी गलत नहीं है।

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